भोजपुरी के एगो सितारा डूब गईल,नीरन जी देहि छोड़ दिहलीं
विनम्र श्रद्धांजलि

पांडे एन डी देहाती /स्वाभिमान जागरण
बड़ा दुख के साथ लिखे के परता की भोजपुरी के एगो थून्ही गिर गईल। अपना शहर देवरिया से लेके विदेश की कई देशन में अपनी माटी के बोली भोजपुरी के भाषा के दर्जा दिआवे खातिर लड़े वाला सेनापति दुनिया छोड़ के चल गईल। डॉ. अरुणेश नीरन जी अस्सी बरिश की उमिर में बाबा गोरखनाथ की धरती गोरखपुर में एक प्राइवेट अस्पताल में इलाज के दौरान हम्मन के छोड़ के चल गईलन।डॉ. अरुणेश नीरन जी के जनम देवरिया ख़ास में 20 जून 1946 के भईल रहे।संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय वाराणसी, महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय वर्धा में सेवा कईला की बाद बुद्ध पीजी कालेज कुशीनगर के प्राचार्य पद से रिटायर भईला की बाद भी नीरन जी जीवन भर भोजपुरी के भाषा के दर्जा दिआवे खातिर लड़ते रही गईलीं।
आईं, उँहा की याद करत उहें के लिखल कुछ लाइन परोस के आपन श्रद्धांजलि दे दीं। देवरिया में 27,28,29 अप्रैल 1995 के आयोजित पहिलका विश्व भोजपुरी सम्मलेन की स्मारिका “सेतु” में अपने देवरिया की बारे में नीरन जी कुछ अइसे लिखले रहनी…
एगो मरल शहर… ‘जहंवा कवनो आन्दोलन के शुरुआत ना भइल……. पुरअसर बहस मुबाहसा ना भइल… प्रतिमान के निर्माण त दूर, कोई बड़ा साहित्यकार तकले ना जनमल….. खामखेयाली के पोलाव खा के झूठ-मूठ ढेकार त भरल गइल बाकी स्थिति ई बा कि रोटी तक नइखने जुड़त ।…. अइसन कमजोर सेहत वाला शहर देवरिया के बारे में लिखे जा रहल बाड़ी’ एगो हलुक चुप्पी…. ‘हुँह का लिखबऽ?’ दोस चुप हो गइलन आ समूचा बहस हमरा चुप्पी से टकरा के टूट गइल। पुरातत्वविद् मित्र के दार्शनिक नियर लागे वाला कमरा खामोश होके फेर अपना सफेदी में डूब गइल। नवम्बर के नीक लागेवाली धूप सामने के लॉन में सिमटत रहे आ मद्धिम मूँगिया उजास के बीच हम याह खास धन के चिन्हे के कोसिस करत रहीं जेकर बेकसूर माटी के सोन्ह महक में हम अबहीं ले घेरयिल महसूस करत रहीं। बस्तीवालू हमर दोस तनीं तिरछा होके अपना जीत के आनन्द लेत रहस आ हम एगो विशाल अनुभव खण्ड के सामने गुजरत ओह लमहा के जुलूस के देखत रहीं जेकरा बीच पूरा दू दशक धुल गएल रहे …… गेंहुआ मूँगा के रंगवाली साँझ जेके देवरिया में हम देखले रहीं…. एगो हिन्दी-सेवी संस्था खातिर अपन सँउसे जिनगी समर्पित करेवाला बूढ़ पण्डित जी…. सभा-भवन के छत पर होमवाली गोष्ठी जवना में दुनिया-जहान के बात होत रहे…. बेला के ताजा खुशबू के समान मँहमँह करत रात. … सबके अपन रंग रहे, अपन गंध । देवरिया के दर्जनन लेखक अनेक अवसर पर बहस के सूत्र अपना हाथ में रखले…. हलांकि बाद में ऊ लोग अपना शहर के धता बताके महानगरन के बीच अपन दुनिया बसा लेलक। तबहूँ देविरया ओइसहीं बा… अबहूँ उहाँ गइला पर निर्धूम वातावरण के शंखलिखित सफेदी देखाई देला…. सभा के लम्बा हॉल के कुर्सियन पर अबहूँ कोहरा सुटुकल मिलेला आ कोहरा के नोक गड़ के गुदगुदावे लागेल……. अइसन देवरिया के बारे में लिखे के मतलब लड़ाई के तनाव भोगल रहे।
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