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कलियुग में भागवत कथा श्रवण मात्र से ही कल्याण सम्भव: शैलेन्द्र शास्त्री 

राम राज्य में कोई भी दुःखी नहीं था, आज हमें उसी भाव कि ज़रूरत है 

मईल l देवराहा बाबा आश्रम स्थित नरियांव ग्राम सभा में पूरा भक्तिमय नजारा दिख रहा है। यहां श्रीमद्भागवत कथा सुनने सैकड़ो श्रद्धालु पहुंच रहे हैं। भगवान के जयकारे लगातार लग रहे हैं। कथा के दौरान राधे राधे की गूंज पूरे इलाके में गूंज रही हैं। परम पूजनीय संत शैलेन्द्र शास्त्री जी महाराज के श्रीमुख से श्रीमद भागवत कथा सुन श्रद्धालु धन्य हो रहे हैं। बांके बिहारी की मूर्ति के समक्ष शीश झुका प्रणाम करके कथा स्थल पर कथा सुनने जा रहे हैं। मंगलवार को कथा का दूसरा दिवस था। सीता कांत तिवारी द्वारा आयोजित इस आयोजन में दूसरे दिवस पर गणेश वंदना,हनुमान चालीसा एवं दिव्य मंत्रो के साथ श्रीमद भागवत कथा की शुरुआत की गई।

भागवत कथा के दूसरे दिन शुकदेव की वंदना के बारे में वर्णन करते हुए कहा कि श्रीमद्भागवत की अमर कथा एवं शुकदेव के जन्म का विस्तार से वर्णन किया। कैसे श्रीकृष्ण ने शुकदेव महाराज को धरती पर भेजा भागवत कथा गायन करने को ताकि कलियुग के लोगों का कल्याण हो सके।

पंडित शैलेन्द्र शास्त्री ने कथा वाचन करते हुए कहा कि भगवान मानव को जन्म देने से पहले कहते हैं ऐसा कर्म करना ,जिससे दोबारा जन्म ना लेना पड़े। मानव मुट्ठी बंद करके यह संकल्प दोहराते हुए इस पृथ्वी पर जन्म लेता है। प्रभु भागवत कथा के माध्यम से मानव का यह संकल्प याद दिलाते रहते हैं। भागवत सुनने वालों का भगवान हमेशा कल्याण करते हैं। भागवत ने कहा है जो भगवान को प्रिय हो वही करो, हमेशा भगवान से मिलने का उद्देश्य बना लो, जो प्रभु का मार्ग हो उसे अपना लो, इस संसार में जन्म-मरण से मुक्ति भगवान की कथा ही दिला सकती है। भगवान की कथा विचार, वैराग्य, ज्ञान और हरि से मिलने का मार्ग बता देती है। राजा परीक्षित के कारण भागवत कथा पृथ्वी के लोगों को सुनने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। समाज द्वारा बनाए गए नियम गलत हो सकते हैं किंतु भगवान के नियम ना तो गलत हो सकते हैं और नहीं बदले जा सकते हैं।शुकदेव जी के जन्म के बारे में यह कहा जाता है कि ये महर्षि वेद व्यास के अयोनिज पुत्र थे और यह बारह वर्ष तक माता के गर्भ में रहे।भगवान शिव, पार्वती को अमर कथा सुना रहे थे। पार्वती जी को कथा सुनते-सुनते नींद आ गयी और उनकी जगह पर वहां बैठे सुकदेव जीने हुंकारी भरना प्रारम्भ कर दिया। जब भगवान शिव को यह बात ज्ञात हुई, तब उन्होंने शुकदेव को मारने के लिये दौड़े और उनके पीछे अपना त्रिशूल छोड़ा। शुकदेव जान बचाने के लिए तीनों लोकों में भागते रहै भागते-भागते वह व्यास जी के आश्रम में आये और सूक्ष्मरूप बनाकर उनकी पत्नी के मुख में घुस गए। वह उनके गर्भ में रह गए। ऐसा कहा जाता है कि ये बारह वर्ष तक गर्भ के बाहर ही नहीं निकले। जब भगवान श्रीकृष्ण ने स्वयं आकर इन्हें आश्वासन दिया कि बाहर निकलने पर तुम्हारे ऊपर माया का प्रभाव नहीं पड़ेगा, तभी ये गर्भ से बाहर निकले और व्यासजी के पुत्र कहलाये। गर्भ में ही इन्हें वेद, उपनिषद, दर्शन और पुराण आदि का सम्यक ज्ञान हो गया था। जन्म लेते ही ये बाल्य अवस्था में ही तप हेतु वन की ओर भागे, ऐसी उनकी संसार से विरक्त भावनाएं थी।इस अवसर पर नरियांव , गोंडवलीं गावों के सैकड़ों भक्त उपस्थित रहें l

Dainik Swabhiman Jagran

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