
संवाददाता देवरिया। समाजसेवी मन्नवर अंसारी ने कहा कि प्रायः कई वर्षो से यह देखा जा रहा कि पुलिस व प्रशासन कस्बा के ताजिये को ही प्रथम, द्वितीय व तृतीय ईनाम देती है। जब गाँव गाँव पुलिस के जवान घूमते ही रहते हैँ तो उन्हें यह देखना चाहिए कि पूरे क्षेत्र में सबसे उत्कृष्ट कलाकारी किस ताजिये में की गई है, ईनाम उस ताजीयेदार को मिलना चाहिए।
लार थाने पर प्रशासन ताजिया मेले में इनाम देते समय गांवों के ताजियों की अनदेखी करता है। कस्बा के अपने जान पहचान वाले ताजीयेदार को ईनाम दिया जाता है लगता है इनाम पहले से तय होते हैं या “जान-पहचान” से मिलते हैं। गांवों की भागीदारी सिर्फ भीड़ बढ़ाने तक रह जाती है।
ये शिकायत अक्सर मुहर्रम के बाद सुनने को मिलती है। कस्बे के ताजियों को इनाम, तारीफ और मीडिया कवरेज मिल जाती है, जबकि गांवों के ताजिए मेहनत के बाद भी पीछे रह जाते हैं।
निर्यायक मंडल द्वारा अक्सर कस्बे के गिने चुने मुख्य ताजियों पर ही नजर डालकर फैसला ले लिया जाता हैं। दूर-दराज के गांवों से आने वाले ताजिए पर ध्यान ही नहीं दिया जाता।
शहरों के ताजियों में लाइट, ऊंचाई और खर्च ज्यादा होता है। गांवों में बांस, कागज और लोक कला से बने ताजिए सादे लगते हैं, भले मेहनत ज्यादा हो।
शहर के आयोजकों के पास सोशल मीडिया, नेताओं और स्पॉन्सर का सपोर्ट होता है। गांव वालों को ये प्लेटफॉर्म नहीं मिलता।
कई जगह इनाम पहले से ही तय होते हैं या “जान-पहचान” से मिलते हैं। गांवों की भागीदारी तो सिर्फ भीड़ बढ़ाने तक ही रह जाती है।
कारीगरी को वजन दें। – सिर्फ ऊंचाई नहीं, हाथ की कला, थीम और मेहनत के नंबर ज्यादा हों। गांवों के कारीगर इसमें आगे रहते हैं। गांवों की कमेटी को शामिल करें इनाम तय करने वाली पंचायत में 50% सदस्य गांवों से हों।
ताजिया इबादत और अकीदत का हिस्सा है, कॉम्पटीशन का नहीं। फिर भी अगर इनाम देना ही है तो इंसाफ सबके साथ होना चाहिए।



